यदि मैं सुंदर होता तो ,
सबके मन भा जाता ।
उपेक्षित हूँ इसलिये कि , मैं विद्रूप हूँ ।
देखिए ना नुकर , न कीजिये ।
और मुझे समझाने की ,
कोशिश से भला ।
मेरे कहने का , अर्थ क्या है ।
यह समझने की , कोशिश कीजिये ।
देखी है मैंने मन्वंतर , की मनोवृति
जिसे परखने के लिए , मैं आज ।
अपनी वास्तविकता को , छुपा गया हूँ ।
और पाया कि बाहरी ,
सुंदरता ही भाती है सब को ।
मन की सुंदरता नही दिखती है ,
यहां किसी को ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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