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जीते जी तो , मुश्किल है कि चैन आये ।

 जीते जी तो , मुश्किल है कि चैन आये ।

जी के बाद आये तो , कह नही सकते ।

वैसे भी जिये में किसी का साथ , वो सह नही सकते ।

पसंद है दुनिया उनको , अकेले ही ।

अपनी खुद की , खुद में समेटना  ।

खुलकर कभी , किसी से वो मिल नही सकते ।

एक ने दिया है दगा तो , 

सब को हांकते है वो , एक ही लाठी से ।

किसी दूजे के लिए ,

 दूजी लाठी वो ,  अब रख नही सकते ।

नफरत इतनी , भारी हुई है के हर दम, 

सीने में लिए चलते है वो ।

गर प्रेम से भी कोई उन्हें मिले , तो लगे दुश्मन सा वो ।

मजबूर है वो , अपने दिल के हाथों ।

दो शब्द प्रेम के वो अब , किसी से कह नही सकते ।


✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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