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इश्क ! क्या कातिल यूँ हुआ करते है ?

 इश्क ! क्या कातिल यूँ हुआ करते है ?

करके घायल जिगर , क्यों छोड़ा करते है ?


कर जाए फना जो , अपनी सर परस्ती में गम ए यार ।

महबूब वो यार के कभी , दगाबाज़ नही हुआ करते है ।


दूर हो के भी एहसास कम न हो , जो प्यार का ।

वो साँचा इश्क है जो , हुस्न के ढल जाने पर भी 

किया करते है ।


दिल को आइना बनाकर , झाँक लेता हूँ मैं जब कभी ।

गुजरे वक्त का लगाना याद आता है ।


हम ख्यालो में रहते है , अब भी उसी तरह बस

तेरा आना और याद आता है ।

यूँ तो मालूम है मुझको , बंदिशें है बहुत तुझ पर ।


मगर बंदिशों को तोड़ कर मिलना , 

आज मुझे , वो जमाना याद आता है ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी




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