रिश्तों में जब , भरोसा टूटता है तब ।
तब ! दिल की हालत , क्या होती है ?
कल्पना मात्र से ही , दिल बैठा जाता है ।
मन क्रोधाग्नि में....
तृण तृण कर ,भस्म हुआ जाता है ।
यूँ तो तब , सब कहते है कि अच्छे हैं ।
यह पूछे जाने पर के , कैसे हो ?
अब क्या कहे कि...
मर मर कर , जी रहे है हम ।
रह गईं है अब ..
जग दिखावे की , रस्में ही ।
किसी समझौते में , बंद होकर ।
लुटे लुटे होश में आये तो क्या ?
अपना सब कुछ खोकर ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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