तुम जो न चिराग जलाते ,
मेरे दिल का ।
तो न ये दिल का जहाँ मेरा ,
रोशन होता ।
रहता गम के अंधेरों में मैं ,
और उदासियों का , सहारा
होता ।
आ जाओ कि अब ,
तुम बिन रहा , जाता नही ।
हसरतें सिमट गई है ,
अब मेरी ।
तेरे इर्द गिर्द आ के ।
मखमली बाहों में तेरे ,
निकले दम मेरा अब ।
तेरा ही होकर मरूँ मैं ,
और कुछ आरजुओं में ,
मेरे अब आता नही ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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