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अपना बचपन और माँ , याद आ गयी ।

अपना बचपन और माँ , 

याद आ गयी ।

जैसी भी थी माँ , माँ थी ।

मारती भी थी तो ,

पुचकारती , दुलारती भी थी ।

माँ तो माँ थी , जैसी भी थी ।

ममता से भरी ,प्यार में खरी थी ।

दुख-सुख में जो , मेरा ख्याल रखती ।

मेरे बिन जो , न खाती न सोती ।

मुझे दिखे बिन जो , चैन से न रह पाती ।

वो माँ ही थी , हाँ वो माँ ही थी ।

बचपन तो बचपन था , 

जवानी में भी , माँ का बहुत सहारा था ।

थका हारा...  

दुनियादारी के ,झंझटों से जब मैं आता ।

माँ की गोद में सर अपना रख कर ।

माँ सहलाती सर मेरा.... 

और मैं , आराम से सो जाता ।

माँ तो माँ थी , 

जैसी भी थी  , माँ तो माँ थी ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

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