तुम हाल ए दर्द मेरा , जान सको तो कहूँ ।
के तुम अब हमसे मेरा , हकीम बनकर न मिला करो ।
कुछ देर तक राहत होती है सिर्फ
जख्म जो नासूर सा है ये ।
तू जा ऐ हकीम अब , रहने दे इलाज ए दर्द ।
मुझे मेरे इन जख्मों के , साये में रहने दो ।
ज्योति प्रसाद रतूड़ी.....✍️
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