सुलग रहा हूँ बनकर ,
अंगारों सा धुँआ धुँआ ।
देख कर वो कहीं ओर है ,
सजाये अपनी महफ़िल ।
काश की उनसे , कभी मिले ही न होते ।
शायद मेरे भी अरमाँ होते , जवाँ जवाँ ।
ख्वाइशें तार तार हो गयीं अब ,
दिल ए चम्मन अब , सब बिखर गया ।
ढूंढता हूँ वो , निशान ए इश्क मैं ,
जो मिले थे मोहब्बत में ,
शायद मिले अब ।
दिल जो मेरा ये टूटकर , टुकड़ों में बंट गया ।
ज्योति प्रसाद रतूड़ी.....✍️
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