तेरा आना जिंदगी थी , जाना मौत मगर...
जी रहे है फिर भी किसी तरह ,
न जाने , किस जुर्म की सज़ा हो ।
दिन भी निकलता है , रात भी ढलती है ।
सुबह और शाम भी होती है मगर...
मेरे शहर में अब वो ,
पहले सा , खुशनुमा समा कहाँ ।
दिल भी है धड़कनों की रावनियाँ भी ,
गाए जो कभी सरगम ये , तुम संग मगर....
मायूसियों के अंधेरों में आज ,
ना जाने गुम है कहाँ , मेरे दिल का जहां ।
तेरा आना जिंदगी थी , जाना मौत मगर...
ज्योति प्रसाद रतूड़ी........ ✍️
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