गरज़ क्या किसी को खत्म हो ,
जो बजूद मेरा ।
फैला था सारी कायनात में मैं कभी ,
आज सिमट कर रह गया है ,
मेरा ढेरा।
मैं सनातन हूँ
हाँ! मैं सनातन हूँ !
अपने ही घर में डरा सहमा सा ,
कभी कत्ल हुआ मैं ।
कभी तलवारों से मुझे ,
धमकाया गया ।
कभी प्रेम पाश में लपेट कर ,
मुझे छला गया ।
सबको छोड़ कर मुझे ही ,
धर्मनिपेक्षता में , उलझाया गया ।
मेरे ही, मेरे विरोधी रहे है ,
सदियों से ।
किया अपना अपना , अलग बसेरा ।
फैला था सारी कायनात में मैं कभी ,
आज सिमट कर रह गया है ,
मेरा ढेरा ।
ज्योति प्रसाद रतूड़ी....✍️
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