सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

गरज़ क्या किसी को खत्म हो , जो बजूद मेरा ।

गरज़ क्या किसी को खत्म हो , 

जो बजूद मेरा ।

फैला था सारी कायनात में मैं कभी  , 

आज सिमट कर रह गया है ,

मेरा ढेरा।

मैं सनातन हूँ 

 हाँ!  मैं सनातन हूँ !

अपने ही घर में डरा सहमा सा , 

कभी कत्ल हुआ मैं ।

 कभी तलवारों से मुझे ,

धमकाया गया ।

कभी प्रेम पाश में लपेट कर ,

मुझे छला गया ।

सबको छोड़ कर मुझे ही ,

धर्मनिपेक्षता में , उलझाया गया ।

 मेरे ही, मेरे विरोधी रहे है , 

सदियों से ।

किया अपना अपना , अलग बसेरा ।

फैला था सारी कायनात में मैं कभी  , 

आज सिमट कर रह गया है ,

मेरा ढेरा ।

ज्योति प्रसाद रतूड़ी....✍️



 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वो कोई अब नहीं पूछता हाल ए दिल..

वो कोई अब नहीं पूछता , हाल ए दिल । बनते फिरते थे जो हकीम , हमारी सलामती पर । शिफा की जरूरत थी अब , और वो नदारद है , हमारी गम ए महफिल से । आंखे पथरा गई है , उनकी राह निहारते । न जाने वो हमारी सूनी महफिल में , आएंगे कब। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

थक गया हूं , फ़ज़ूल के इस सफर से ।

थक गया हूं , फ़ज़ूल के इस सफर से । थोड़ा आ ऐ जिंदगी ! संग मेरे , तू भी सुस्ता ले । रहा है साथ तेरा जन्म से , और रहेगा मरण तक । सफर लम्बा रहा है , अब तलक । न जाने आगे रहेगा साथ , कब तलक । आ बैठ पास उर से निकल , पढ़ तो ! प्रभु ने भाग्य लेख में मेरे , क्या क्या रचना रची है । ढल गया हूं जिस्म से , देख तो । मेरे चेहरे पर चमक , कितनी बची है? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी"मलंग"

हाँ माँ सच तुम होती जो संग हमारे ।

 हाँ माँ मैने खाया आम कच्चा , मैं हूं तेरा लाडला बच्चा । एक आने के लिए फाल्से, दिए बाबा ने केवल चार । तुम भी होती संग नानी के , खाती तुम भी आम का अचार । नाना ने गाड़ी में बिठाया , मेला सारा हमें घुमाया । इक अन्नी का बजा मुझे , मुन्ना को गुब्बारा दिलवाया । नाना ने फिर टपरी में जाकर , चाय पकौड़ी और नमकीन खिलवाया । हाँ माँ ! सच तुम होती जो संग हमारे , चरखी , झूला , नाच कठपुतली का देख कर संग में बजाते ताली । शोर-शराबा कहीं हाथी भालू , नाच रही थी बंदरिया मतवाली । हाँ माँ मैंने खाया आम कच्चा ,मैं हूं तेरा लाडला बच्चा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी