हम तो आज भी अजनबी है ,
तेरे शौक ए नज़र में ।
बस फर्क इतना सा है कि ,
तुम्हे अब मेरा पता मालूम है ।
हम तो करीब आ कर ,
भी दूर ही रहे ।
सोचा फिर के , क्या फायदा ?
यूँ घुट घुट कर , संग रहने का ।
इस लिए तेरी दुनिया से ,
रुख्सत हम ,
हमेशा के लिए , हो चले ।
ज्योति प्रसाद रतूड़ी.... ✍️
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