ऐ मेरे रूठे हुए ख्वाब ,
आ जा !
मुद्दतों से तुझे हमने , देखा नही ।
सोये भी हम बहुत मगर ,
संग तुम थे जब ।
वैसा आज तलक ,
फिर कभी हम , सोये नही ।
ऐ मेरे रूठे हुए ख्वाब ,
आ जा !
मुद्दतों से तुझे हमने , देखा नही ।
ज्योति प्रसाद रतूड़ी. .....✍️
ऐ मेरे रूठे हुए ख्वाब ,
आ जा !
मुद्दतों से तुझे हमने , देखा नही ।
सोये भी हम बहुत मगर ,
संग तुम थे जब ।
वैसा आज तलक ,
फिर कभी हम , सोये नही ।
ऐ मेरे रूठे हुए ख्वाब ,
आ जा !
मुद्दतों से तुझे हमने , देखा नही ।
ज्योति प्रसाद रतूड़ी. .....✍️
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