काश ....
काश के दिन वो , बचपन के फिर लौट जायें ।
खेलेंगे फिर अपना , वही खेल पुराना ।
कभी मैं तो कभी तू करें , अपनी अपनी आंखें बंद ।
कभी मैं तो कभी तू पूछे , छुप गए तो आ जायें ।
कभी मैं तो कभी तू , बारी बारी से छुप जायें ।
काश.....
काश के हमारी दुआ , कबूल हो जायें ।
मैं तुझे और तू , मुझे फिर कहीं मिल जायें ।
ज्योति प्रसाद रतूड़ी......✍️
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें