पास न सही तू , दूर ही सही ।
अपना न सही तू , गैर ही सही ।
मगर रहता है तू , न जाने क्यों ?
इस दिल के करीब ही.....!
करीब भी इतने कि,
हम तुमसे से अपने ।
दिल के हर सवालात
हर ख्यालात ,
सहज़ कह देते है ।
हो न पल दो पल , दीदार तेरे तो ,
कयामत सी आ जाती है ।
निकलता देखूं जब....!
चेहरा तेरा , तेरे घर के झरोखे से तो ,
सीने में राहत की , साँसे आ जाती है ।
ज्योति प्रसाद रतूड़ी✍️
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें