यूँ , अकेले क्यों गुजारते हो ,
जीवन के यह अनमोल लम्हें ।
ज़रा इक नज़र इधर तो ,
करम फरमाओ ,
आपकी इनायत होगी ।
जिंदगी की इन , सुनसान राहों में तन्हां अक्सर ।
दूर तलक जा कर ,
लौट आती है , मेरी यह बेबस निगाहें ।
तुम साथ दो मेरा , आपकी इनायत होगी ।
ज्योति प्रसाद रतूड़ी✍️
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