हाल ए गम , क्या बतायें हम ।
बड़ी तब्दीली हो गयी है यार! अब , तेरे मयखाने में ।
बदले बदले है यहाँ , साखी और पैमाने भी ।
अब नही है इलाज़ कोई ,
मेरे इस दिल का , तेरे इस मयखाने में।
तेरे लब ए जाम की , नही कोई मिशाल
ऐ मेरे हुश्न ए दिल !
यह चित मेरा , तुझ पर ही बुझा है ।
तू गैर है.....!
बहुत थक गया हूँ , खुद को यह समझाते-समझाते ।
मालूम है कि , तू हासिल नही है मुझे ।
ना जाने क्यूं उम्मीदों से लगा हूँ , तुझे पाने में ।
डर है कि कहीं यह ,
जनून ए इश्क मेरा , कयामत न ला दे ।
ले लो इज़ाजत अब तुम , मेरे दिल से निकल जाने की ।
✍️ज्योति प्रसाद रतुड़ी
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