जौंका जिकुडी का काख म थै हमु , कभि का दिनु
आज कुज्याणी किलै रूसायां छिन उ मुख मोडिक ।
अब नि औणन उ दिन हैंसदा खेल्दा सच्ची , कभी बोड़िक ।
बचपन कु सँग साथ छूटी , छूटीन गौं गूठ्यार ।
ना जाणि कै देश , कै मुलूक छिन उ ,
ना जाणि कथगा छ उकाल , वख जाण कय्यिं ।
अर न जाणि कथगा छे, उन्ध्यार ।
✍️ज्योति प्रसाद रतुड़ी
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