यूँ तो तेरी इस , रंग ए महफ़िल में ।
तरानों की कोई , कमी न थी ।
मगर छेड़ दे जो , मेरे दिल के तार ।
ऐसा कोई , फनकार न मिला ।
***
खुद को जलाकर , खाक कर दिया हमने ।
फिर कैसे न कहें हम के , तेरे तलबगार हम नही ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
यूँ तो तेरी इस , रंग ए महफ़िल में ।
तरानों की कोई , कमी न थी ।
मगर छेड़ दे जो , मेरे दिल के तार ।
ऐसा कोई , फनकार न मिला ।
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खुद को जलाकर , खाक कर दिया हमने ।
फिर कैसे न कहें हम के , तेरे तलबगार हम नही ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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