यूँ लगता है मुझे , मेरा वसंत फिर लौट आया है ।
आप आये , आप आये के बाहार आयी है ।
हूँ अकेला ही , हूँ अकेला ही मगर अहसास तेरा
ही है मुझ को ,
संग संग चलता जो मेरे , वो साया ही है तेरा ।
यूँ लगता है .....
गुनगुनाता हूँ जब भी कोई गीत ,(2)
तुम ही ख्यालों में होते हो ।
रख सर अपना मेरे कांधों पर ,
और गुम सी किसी ख्यालों में ।
हाथ जब उठता है मेरा , सहलाने को ।
तेरे रेशमी बालों पर ,
कस लेती हो तुम मुझको,
फिर अपनी बाहों में ।
ये ख्वाब है, ये ख्वाब है
मुझ को इस ख्वाब में ही , जी लेने दो ।
पता क्या , पता क्या फिर ये ख्वाब हो न हो ।
यूँ लगता है , मेरा बसंत फिर लौट आया है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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