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न चल अंगारों में , तपिस बहुत है ।

 न चल अंगारों में , तपिस बहुत है ।

जल कर खाक न हो जाये कहीं,

हसरत तेरे इश्क़ की ।।

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यदि कभी न उतर पाऊँ खरा , तेरे पैमाने पर ।

गुजारिश है तुझसे , बेबफाई का इल्जाम न देना ।

होगी कोई मजबूरी उनकी ...

यह कह कर , अपने दिल को समझा लेना ।।

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कोशिश बहुत की छुपाने की इश्क ,

मगर हमारी सूरत ,  हाल ऐ दिल बयाँ कर गयी ।

पल पल गुजर रहा है..... 

वक्त अब हमारा , सालों के "हिसाब "

दिन करीब न आए कभी वो , शबब बने जो जुदाई का ।।

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इलज़ाम बेदर्दी का , न लगाव मुझ पर । 

हमने अक्सर , दर्द को ही पिया है।

भीड़ बहुत थी जहां में मगर , 

हर पल हमने खुद को , तन्हां होकर कर ही जिया है ।

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मिला मुक्कदर , कुछ पल ही सही ।

मगर खुश रहने के लिए.......

यह दौर  मुलाकात का  , काफी है हमारे लिए ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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