खिंच जाए जो लकीर , बन कर दरार रिश्तों में ।
फासले हो जो इजात , दरम्यां दिलों के ।
न पैदा करो हालात कभी ऐसे ,
जो घाव दुखता रहे , नासूर बनकर ।
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न रास्ता कठिन होता है , न आसान होता ।
बस वो राही पर , निर्भर करता है कि
वो कितना धैर्यवान है ।
जो परस्थितियों से न घबराए ,
मंज़िल उसी को मिला करती है ।
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मेरा आना लौट कर मुमकिन है बस..
ये बात अलग है कि , तुम हमसफ़र बन कर न चलो।
जो शब्द पिरोये है हमने , तन्हाई में अक्सर..
रहा अक्स तेरा , मेरी नज़रों के समाने।
बस इक दीवार ही थी ,आर पार नज़र आता था ...
कभी हम देखते थे तुम्हें ,
कभी तुम शरमा जाती थी , ख्यालों में।
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कुछ कुछ अब , अहसास होने लगा है ।
की शायद , यह रोशनी ही मुझे....
अंधकार में डुबो जाएगी ।
फिर न हसरत ही रहेगी ,जीने की ...
और न आरजू ही , मारने की ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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