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मेरा आना लौट कर मुमकिन है बस..

 खिंच जाए जो लकीर , बन कर दरार रिश्तों में ।

फासले हो जो इजात , दरम्यां दिलों के ।

न पैदा करो हालात कभी ऐसे ,

जो घाव दुखता रहे , नासूर बनकर ।

****

न रास्ता कठिन होता है , न आसान होता ।

बस वो राही पर , निर्भर करता है कि

वो कितना धैर्यवान है । 

जो परस्थितियों से न घबराए ,

मंज़िल उसी को मिला करती है ।

****

मेरा आना लौट कर  मुमकिन है बस..

ये बात अलग है कि , तुम हमसफ़र बन कर न चलो। 

जो शब्द पिरोये है हमने , तन्हाई में अक्सर..

रहा अक्स तेरा , मेरी नज़रों के समाने।

बस इक दीवार ही थी ,आर पार नज़र आता था ...

कभी हम देखते थे तुम्हें ,

कभी तुम शरमा जाती थी , ख्यालों में।

****

कुछ कुछ अब , अहसास होने लगा है ।

की शायद , यह रोशनी ही मुझे....

अंधकार में डुबो जाएगी ।

फिर न हसरत ही रहेगी ,जीने की ...

और न आरजू ही , मारने की ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी


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