थी मौज ,क्या आंनद था उस जमाने में ,
थी टूटी चप्पल भले , मज़ा आता था चलने में ।
कपड़े रहे भले कम थे , तब भी ठंड की मजाल कहां ।
रोक सके जो हमें , लुफ्त बहार से लेने में ।
थी रोटी चाय , सुबह की हो शाम की ।
सताए भूक , तो वो कंद मूल सी बात कहां ।
थे खेल वो निराले , मेले भी वो मतवाले ।
यही सोचते है हम कि ,
क्या फिर होंगे कभी हम , वो ही दिल वाले ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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