उलझनों का सिलसिला कुछ , इस क़दर चला ।
जितने सुलझाते गए हम ,
उससे कई ज्यादा , उलझते चले गए ।
सोचता हूं "मलंग" क्या होगा आगे तेरा ।
क्या कमी परवरिश की है , या किस्मत तेरी ।
समय की बिसात पर भी नहीं कोई ,पक्षधर तेरे ।
वरना तू अकेला ही तो नहीं , आया इस जहां में।
बुरा नहीं तू , न आव ओ हवा ही बुरी तेरी ,
रहम भी है दिल में तेरे , फितरत भी आजाद जीने की ।
है दर्द भी सबके लिए पाले जो दिल में लिए तू ।
"मलंग"
वो अपना काम निकाल कर , छोड़ जाते है तुझे ।
बदल डाल अब खुद को तू , छोड़ दे साथ उनका जो डूबो दे तुझे ।
जीवन पथ पर सफ़र लंबा है अभी , मजिल पाने के लिए ।
हासिल होगा मुकाम तुझे , संकल्प बांद ले ।
छोड़ कर निराशा के बीज भाव , अशाओ के दीप जला ले ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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