जिंदगी भी ठहरी तो कहां आके ,
ऐ दोस्त !
ना आएंगे पास तो , जाएंगे भी दूर नहीं ।
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तुम भी तो कुछ बोलिए , मुख अपना खोलिए ।
माना बंदिशे है बहुत , माना बंदिशें है बहुत
मगर हम इशारों को समझने का , हूनर बाखूबी जानते है ।
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रहता हर वक्त , तेरा इंतज़ार क्यूं है ,
ऐसी भी तो कोई , बात नहीं है
बीच हमारे ।
फिर कुछ खास होने का , अहसास क्यों है ।
न तो चाहत है कोई , ना आरज़ू ही ।
फिर छुपी हुई हो , कोई हसरत जैसे ।
दिल को यह , अहसास क्यों है ।
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रख दिया आमने - सामने , किताब हमने जिंदगी की ।
पढ़ सको तो पढ़ लो ,
हर्फ कोई अब , छिपा नहीं
रहा क्या फसाले , दरम्यान अब हमारे , तुम्हारे ।
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नींद हमारी , ख्वाब तुम्हारे ।
सोते है इन्हीं, के सहारे ।
टूट ना जाना सपने प्यारे ,
जब तलक ना हो , वो हमारे ।
***
दिल की सुनी पड़ी वीणा के तार ,
फिर से छिड़ने लगे ।
बजने लगा कोई संगीत पुराना ।
चोट आपने भी खाई है , मोहब्बत में शायद ,
वरना.....!
समा यूं न उधर भी , गम का होता ।
***
वफा और प्यार ,
बस....!
इतना हो दोस्त !
ना प्रीत छूटे , ना दिल टूटे ।
***
हमने पूछा उनसे , कहो क्या लिखूं तुझ पर मै ?
ऐतबार उनका देखिए
"जैसा दिल तुम्हारा चाहे"
जबाव मैं उसने ऐसा कह दिया ।
प्यार उनकी मासूमियत पर , कुछ और गया ।
कैसे दगा दूं उनको मैं ,
जिसने अपने दिल में मुझे ,
इस क़दर बिठा दिया ।
***
तू चांद है मेरा ऐ दिल !
चाहता तुझे भी , मै बहुत हूं ।
पर छोड़ भी कैसे दूं , मैं अपने सूरज को ।
उससे उजाला है , मेरे सवेरे का ।
ना रह सकता हू, तेरे बिना ।
ना जी सकता हूं , उनके बिना ।
तू साज है तो वो ...
तराना है , मेरी महफिल का ।
,✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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