हां गुजर रही है जिंदगी , मेरी भी यहां पर ।
कोई ख्वाब का बोझ लिए के , हमसफर होते जो तुम ।
कसम से बहुत सकून से , गुजरती तब जिंदगी ।
ना सिकवा होता ना शिकायत ही खुदा से कोई ।
बन जाते हम नावाज , मेरे जो तुम ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
हां गुजर रही है जिंदगी , मेरी भी यहां पर ।
कोई ख्वाब का बोझ लिए के , हमसफर होते जो तुम ।
कसम से बहुत सकून से , गुजरती तब जिंदगी ।
ना सिकवा होता ना शिकायत ही खुदा से कोई ।
बन जाते हम नावाज , मेरे जो तुम ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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