वो अभी तक खुद को , शातिर समझे हुए है ।
और हम...!
जान कर भी अंजान , खुद को बनाए हुए है ।
हां शायद...!
इससे अच्छा , झूठ न चलने वाला था "मलंग"
के हम नही है वो....!
और वो....!
सर ए आम रंग ए महफिल , सजाए हुए है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
वो अभी तक खुद को , शातिर समझे हुए है ।
और हम...!
जान कर भी अंजान , खुद को बनाए हुए है ।
हां शायद...!
इससे अच्छा , झूठ न चलने वाला था "मलंग"
के हम नही है वो....!
और वो....!
सर ए आम रंग ए महफिल , सजाए हुए है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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