क्या कहे कि ना अब वो कशिश है ,तेरी गुफ्तगू में ।
ना ही जुस्तजू है अब कुछ कहने और कुछ सुनने की ।
इक दस्तूर ही महज रह गया है अब , कुछ लफज मुलाकातों का ।
चलती मैं जैसे कदम रोक लिए कुछ , दो शब्द कहने सुनने में ।
अब तो हमारे कहे शब्द भी , बुरे लगने लगे है ।
शायद जरूरत से ज्यादा ही हम , कुछ कहने लगे है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।
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