पा के प्यार उसका कैसे ,
भूल जाऊँ मैं ।
जिसने कई रातें गुजारी हो ,
मेरे इंतज़ार में ।
हां ये बात अलग है अब ,
वो पहला सा प्यार नहीं ।
मगर रह जाए वो मेरे बिन जुदा ,
यह मुमकिन भी नही ।
दिखने चाहिए इक दूजे को ,
पल पल झलक इक दूजे की ।
वरना दिल , बहुत घबरा जाता है ।
रहे साथ यह भी तो , नही सुहाता है ।
यह कैसा प्यार है मेरे प्रभु !
यह मुझे समझ में , क्यों नहीं आता है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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