मैं तो तब भी रहा और अब भी हूं ,
तेरे प्रेम का प्यासा ।
ना बुझी थी प्यास तब ..!
और उर कंठ अब भी , शुष्क पड़े है ।
आओ अब तो दर्शन , दे दो कान्हा !
कितने जन्म लेने और , अब शेष पड़े है ।
हो जाऊं पार इस , माया के भव सागर से ।
जन्म मरण के इस , चक्र कुचक्र से ।
रख दो हाथ तुम , सर पर मेरे ।
मैं मोक्ष को , प्राप्त हो जाऊं ।
कान्हा मेरे अबकी आना ,
मेरे दुखों को हर ले जाना ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
Bahut Acha cha-cha ji
जवाब देंहटाएंशुभाशीष बाबा !
हटाएं