हाय रे सफर क्या मस्त था वो ,
जब हम कभी , जवां हुआ करते थे ।
इन्हीं राहों में गुबार ए धूल ,
हम भी अपने कदमों से ,
जब कभी उड़या करते थे ।।
लाचार हुए चलने में आज , बेबस हुए कदम ।
इक तिनका बहुत , सहारा जो मिले ।
खोजती है ये निगाहें आज , उस सहारे को ।
जिसको नजर अंदाज कभी , किया करते थे हम ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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