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बहारों ने अब शायद , मुस्कुराना छोड़ दिया

बहारों ने अब शायद , मुस्कुराना छोड़ दिया ।
क्योंकि अब...!
उन्होंने हमारे दिल के आंगन में , आना छोड़ दिया ।
नही थमा करती थीं जिनके कदम  कभी ,  
चहल कदमी को  हमारे संग ।
आज संग हमारे चलाना , उन्होंने छोड़ दिया ।
यूं तो ना पेश आए वो कभी , राह ए मोहब्बत में खुलकर ।
मगर , 
अदाओं में उनके मोहब्बत के , पैमाने छलका करते थे ।
रहता था मस्त "मलंग"
 देख कर उनके  हुस्न ए मयखाने को ।
उन्होंने आज मोहब्बत का , वो पैमाना तोड़ दिया ।
उनकी बज़्म में आज , हम है मगर ...
उनके तकल्लुफ ने मेरी तरफ , 
आज मुखातिफ होना छोड़ दिया ।

बहारों ने अब शायद , मुस्कुराना छोड़ दिया ।
क्योंकि अब...!
उन्होंने हमारे दिल के आंगन में , आना छोड़ दिया ।
रहेंगी सूनी , सूनी सी , यह दिल की दुनिया अब ।
रंग ए बहार अब , मेरी जिंदगी के , 
फीके फीके से , हुए जातें है ।
मेरे दिन ओ रात अब , उदासियों में घिरे जाते है ।
देखता है टकटकी भर ,दिल बनकर चकोर ,
  उम्मीदों के आसमां पर ।
शायद दिख जाए वो कहीं , 
दिल का चांद....
जिसने अब मेरे शहर में आना छोड़ दिया ।

बहारों ने अब शायद , मुस्कुराना छोड़ दिया ।
क्योंकि  अब...!
उन्होने हमारे दिल के आंगन में , आना छोड़ दिया ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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