हे.. हे.. हे...! आ...आ...आ ह....!
हुं हूं ह उं....
पिडा बटोली क ल्यायों मी आज माया लै की ,
आयों बोडी जब मी उंका मुलूक छोडिक ।
ना रोकि उं म्यारू बाटु ना क्वी सौ ना कारार,
ना बोली उं ना जवा मी छोडिक ।
रैयूं सासा... रैयों सासाा भिण्डि दूर तलक भी,
मी थै धै लगालि वा ।
मुड़िक पछनै देखि त जनी ,
हाथ हल्कैकि , मी खुणि बुलोणी छ वा ।
दौडी गै मी अंग्वाठि मा , जाण का उंका ।
जनी पोंछी पोंछी मी वख मा , ना जाणी कख गै वा ।
पिडा बटोलि क ल्यांयों मी....
सच्ची बोदौं भुळो मी तुम , माया नि लयान माया नि लयान ।
भरेन्दु नि घो मिलदू जु माया मु , देंदू जु कुई निर्मोहि ।
कै कि मयाली छ्यूं मा ऐकी, कै तै अपणु दिल न दियान ।
सैडी सैंडी रतियों मा..२ होड फरकि फरकी क ,
रात बिती जांदी रात बीति जांदी ।
न दिन कु चैन छ अब ये दिल मा ,
ना अब यूं आखियों मा नींद आंदी ।
पिडा बटोळी क ल्यायो मी....
अपणा आंसुं....आंसू मीन पेट उंद समै ।
खुद रोयों मी अर , जग मीन खूब हंसै ।
रूमनांदि माया म्यारि जिकुडी झुरआंदी, जिकुडी झुरांदि ।
तोडी माया जौन्न मीतै ,
किले आज , उंकी याद आंदी ।
किलै नि मिटदि होली याद पुराणी , याद पुराणी ।
पिडा बटोळि क ल्यायों मी...
✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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