बहुत दिनों से न लिखा कुछ , मेरी कलम तूने ।
क्यों ?
क्या जज्बातों के बाज़ार में तुझे अब ,
कोई दिल तड़पता हुआ नही दिखा ?
खामोश है क्यों ,कई जमाने से ?
देख तो सही , मेरे दिल में झांक कर ।
अब भी बाकी , दर्द ए निशान है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
बहुत दिनों से न लिखा कुछ , मेरी कलम तूने ।
क्यों ?
क्या जज्बातों के बाज़ार में तुझे अब ,
कोई दिल तड़पता हुआ नही दिखा ?
खामोश है क्यों ,कई जमाने से ?
देख तो सही , मेरे दिल में झांक कर ।
अब भी बाकी , दर्द ए निशान है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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