कई दिनों के बाद , आया हूं मैं.....तेरे शहर ।
अनजान सी नही वो गलियां ,
जहां मिले थे हम.....मगर ।
अब बदली बदली सी ,
ना जाने क्यों लगती है.....वो डगर ?
ठहर तो कुछ देर और कि ,
देख लूं तुझे जी......भर ।
फिर ना जाने कब हो आना....मेरा
तेरे इस शहर ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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