ये राहें गुजरते वक्त का , निशां होंगी ।
पलकों में जमी गर्त , उम्र की ढलान लिए ।
यादों में संजोए होंगे गुजरे पल ,
कुछ खट्टे कुछ मीठे ।
एक लालसाई भर ये नज़र ,
जब तरसेगी , देखने इन राहों को ।
फिर कौन दिखायेगा , इन नजारों को ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
ये राहें गुजरते वक्त का , निशां होंगी ।
पलकों में जमी गर्त , उम्र की ढलान लिए ।
यादों में संजोए होंगे गुजरे पल ,
कुछ खट्टे कुछ मीठे ।
एक लालसाई भर ये नज़र ,
जब तरसेगी , देखने इन राहों को ।
फिर कौन दिखायेगा , इन नजारों को ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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