तेरी यादों ने एक पल भी ,
सोने नहीं दिया ।
पलकों के बंद होते ,
चेहरा तेरा दिखता था ।
हर करवट पर ,
तेरे होने का एहसास ।
ना जाने क्यों ,
मुझे हुआ करता था ।
क्यूं होता है मुझे ऐसा ,
अक्सर ।
तू है क्या , मुझ में बसर ?
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
तेरी यादों ने एक पल भी ,
सोने नहीं दिया ।
पलकों के बंद होते ,
चेहरा तेरा दिखता था ।
हर करवट पर ,
तेरे होने का एहसास ।
ना जाने क्यों ,
मुझे हुआ करता था ।
क्यूं होता है मुझे ऐसा ,
अक्सर ।
तू है क्या , मुझ में बसर ?
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें