सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

दर्द बहुत है , दर्द ए दिल की दवा क्या है ?

दर्द बहुत है...!

दर्द ए दिल की , दवा क्या है ?

मुमकिन हो कि , मिल जाए दवा कहीं ।

ऐ खुदा बता....!

उस मुकाम का पता , क्या है ?

बहुत तलाश किया  , मगर सकून ।

मिला तो , कहीं भी नही ।

है भी क्या , कहीं जमाने में ?

है तो , उसका पता क्या है ?

धुंधलाती नजर अब , थक चुकी ।

लौट आई वापस अब ,

अंखियों के झरोखों में ।

हो कब न जाने बंद, ये पलकें अब ।

रहूं कब तलक , इस इंतजार में ।

वो वक्त मेरे नसीब का , है भी क्या ?

जो मिलें चैन मुझे ,सदा की खातिर ।

है जो वो वक्त तो ,उस वक्त का पता क्या है ?

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वो कोई अब नहीं पूछता हाल ए दिल..

वो कोई अब नहीं पूछता , हाल ए दिल । बनते फिरते थे जो हकीम , हमारी सलामती पर । शिफा की जरूरत थी अब , और वो नदारद है , हमारी गम ए महफिल से । आंखे पथरा गई है , उनकी राह निहारते । न जाने वो हमारी सूनी महफिल में , आएंगे कब। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

थक गया हूं , फ़ज़ूल के इस सफर से ।

थक गया हूं , फ़ज़ूल के इस सफर से । थोड़ा आ ऐ जिंदगी ! संग मेरे , तू भी सुस्ता ले । रहा है साथ तेरा जन्म से , और रहेगा मरण तक । सफर लम्बा रहा है , अब तलक । न जाने आगे रहेगा साथ , कब तलक । आ बैठ पास उर से निकल , पढ़ तो ! प्रभु ने भाग्य लेख में मेरे , क्या क्या रचना रची है । ढल गया हूं जिस्म से , देख तो । मेरे चेहरे पर चमक , कितनी बची है? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी"मलंग"

हाँ माँ सच तुम होती जो संग हमारे ।

 हाँ माँ मैने खाया आम कच्चा , मैं हूं तेरा लाडला बच्चा । एक आने के लिए फाल्से, दिए बाबा ने केवल चार । तुम भी होती संग नानी के , खाती तुम भी आम का अचार । नाना ने गाड़ी में बिठाया , मेला सारा हमें घुमाया । इक अन्नी का बजा मुझे , मुन्ना को गुब्बारा दिलवाया । नाना ने फिर टपरी में जाकर , चाय पकौड़ी और नमकीन खिलवाया । हाँ माँ ! सच तुम होती जो संग हमारे , चरखी , झूला , नाच कठपुतली का देख कर संग में बजाते ताली । शोर-शराबा कहीं हाथी भालू , नाच रही थी बंदरिया मतवाली । हाँ माँ मैंने खाया आम कच्चा ,मैं हूं तेरा लाडला बच्चा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी