तेरी याद आ रही है ....!
ये ही सच है जो कह नही सकता मैं , जमाने से ।
डर ना होता तेरी रुसवाई का तो ,
कब का ले आता तुझे मैं , अपने कूचे में ।
(पहले चलने वाली से तो पूछ लो 😂😂)
जरूरत ही क्या , उन सवालातों को पूछ कर ।
जवाब जिनका हम जानते हैं ।
इनकार ही था तब और अब , आगे भी ।
बस नशीबों में आहें ही तो है , मेरी हमदम बनकर ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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