अब तो मक़सद ही न रहा कुछ ,जीने का ।
बस....!
अब तो बेवजह ही , जीती लाश ढोए जा रहा हूं मैं ।
बची हुई उम्र न जाने कब ,खत्म होगी ।
बस....!
अब इसी इंतजार में , जिए जा रहा हूं मैं ।
हैं तो बहुत अपने आसपास मेरे , मगर खामोश है सब.....!
करे कोई गुफ्तगू मुझसे भी , क्यूं यह आश किए जा रहा हूं मैं ।
खुदा भी रूठ गया है , शायद मुझसे ।
अपनी आगोश में काश , भर लेता वो मुझे ।
तो , क्या हर्ज था ?
ना जाने वक्त क्यों , इतना लगा रहा है वो ।
यही हर दम , सोचे जा रहा हूं मैं ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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