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काश जमाने की रुसवाई का हमें डर न होता....!

काश जमाने की रुसवाई का हमें डर न होता....!

तुम हमारे दिल के करीब हो यह , 

दुनिया से हमने छुपाया न होता ।

आज खुशी का आलाम है यह जो....!

हम तुम ने इसे मिल जुल , कर मनाया होता ।

तुझे भूल चुके थे कब के हम शकुन की खातिर....!

काश कि तुम्हें खोकर , फिर से हमने पाया न होता ।

हम तो ना जुटा पाए साहस खुद में , तुम्हें अपनी खुशी में शरीक करने की ।

करो शामिल तुम हमें क्या खुशी में अपनी , 

यह हक काश हमने गंवाया न होता ।

अब तो देर बहुत हो चुकी है "मलंग" 

काश के वक्त रहते हमने , हर मामलात को सुलझाया होता ।

✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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