दर्द छुपाने का हुनर जो सीख लिया है हमने ।
कसम से....!
शिकायत की अब किसी से , कोई गुंजाइश न रही ।
हर कोई अब , हाल ए मिजाज ब खुशी पूछ जाता है।
छुपाकर शिकन चेहरे का , दुरुस्त हैं हम कह लेते है ।
अंदर की हम ही जानते है , हां बाहर से खुश रह लेते है।
निभाते है अब फ़र्ज़ "मलंग" , जब तक जी रहें है ।
सांसों का आना जाना ही है अब , मन से कहां अब जी रहें है हम ।
कवि हूं न यूं ही ख्यालों में ही , डूबा रहता हूं ।
सुबह न शाम की खबर ,
क्या पता क्या खा , क्या पी रहे है हम ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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