न हैरान हो , न परेशान हो ऐ "मलंग"
दिन चार ही है , लाए हम मांग कर ।
एक गुजार दी खेल में , थी उम्र जो बाल की ।
दूसरी गुजरी काम में , थी जो उम्र यौवन की ।
तीसरी अब चल रही है ,
है जो उम्र न इधर की , न उधर की ।
थका हारा , बस हिसाब लगाना उम्रभर का ।
कंपकंपाते हाथों से ,पसीने की बूंदों को चेहरे पर से पोंछना ।
लड़खड़ाते कदमों को , सहजता से रखना ।
कमर के झुकाव को,
कुछ देर ठहर कर , तनकर खड़ा होना।
और इंतजार अब , उस चौथे दिन का ।
आए कब वो , और सोए आराम से हम जी भर ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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