काश के तुम हम रूबरू मिले होते ,जिंदगी के दीए फिर न यूं उदास होते ।
कहूं क्या मुकद्दर का के काश , दिन ओ रात हम तुम संग में गुजारे होते ।
बहुत आग है तड़प में , जलता है जिया मेरा ।
काश तू आती , मेरे तन से लिपट जाती ।
बुझ जाती आग ये तड़प की , मैं चूमता बदन तेरा ।
खिल उठती आशाएं मेरी , झूमता गाता मन मेरा ।
काश के तुम हम रूबरू मिले होते , जिंदगी के दीए फिर न यूं उदास होते ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी "मलंग"
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें