वो आए याद इतना कि, जी भर आया ।
कम वक्त अश्क छलक गए , और चेहरा धुंधलाया ।
देखता था जिसे मैं जी भर ,
वो देखो वो चांद भी निकला बेवफा अब ।
जरा सी नज़रें क्या झुकाई हमने , वो
बादलों के बीच समाया ।
हमें डर गलता है अब रोशनी से , बुझा दो चिराग महलों से ।
हमें छोड़ दो अब तन्हा यारों , महफिल से अब डर लगता है ।
वो आए याद इतना कि, जी भर आया ।
कम वक्त अश्क छलक गए , और चेहरा धुंधलाया ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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