सब कुछ कुशल है किंतु, फिर भी हृदय मेरा चिंतित और व्यथित है ।
नहीं बिठा पा रहा हूँ खुद को , उनके बनाए सांचे में ।
शायद बूढ़ा हो गया हूँ , कुछ खुरदुरा और कुछ अड़ियल भी ।
और.....! और अब तो उनके लिए मैं तथाकथित भी ।
सोचता हूँ कि कर लूं किनारा अब मैं अपनी जर्जर कश्ती को ।
शायद मेरी पुरानी क्षय पतवार में अब ,खेने की वो ताप नहीं ।
मतलबी है यह संसार , सिवा जन्म दाता के ।
संताप से क्षुब्ध हूँ ,हृदय पीड़ा से संकुचित है।
मन में एक टिश सी चुभी है जो मेरे वो , कमवक्त निकलती ही नहीं ।
बस इसी कशमकश से मन बेचैन और द्वंदित है ।
सब कुछ कुशल है किंतु, फिर भी हृदय मेरा चिंतित और व्यथित है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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