सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

सब कुछ कुशल है किंतु...


सब कुछ कुशल है किंतु, फिर भी हृदय मेरा चिंतित और व्यथित है ।


नहीं बिठा पा रहा हूँ खुद को , उनके बनाए सांचे में ।


शायद बूढ़ा हो गया हूँ , कुछ खुरदुरा और कुछ अड़ियल भी ।


और.....! और अब तो उनके लिए मैं तथाकथित भी ।


सोचता हूँ कि कर लूं किनारा अब मैं अपनी जर्जर कश्ती को ।


शायद मेरी पुरानी क्षय पतवार में अब ,खेने की वो ताप नहीं ।


मतलबी है यह संसार , सिवा जन्म दाता के ।


संताप से क्षुब्ध हूँ ,हृदय पीड़ा से संकुचित है।


मन में एक टिश सी चुभी है जो मेरे वो , कमवक्त निकलती ही नहीं ।


बस इसी कशमकश से मन बेचैन और द्वंदित है । 


सब कुछ कुशल है किंतु, फिर भी हृदय मेरा चिंतित और व्यथित है ।


✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वो कोई अब नहीं पूछता हाल ए दिल..

वो कोई अब नहीं पूछता , हाल ए दिल । बनते फिरते थे जो हकीम , हमारी सलामती पर । शिफा की जरूरत थी अब , और वो नदारद है , हमारी गम ए महफिल से । आंखे पथरा गई है , उनकी राह निहारते । न जाने वो हमारी सूनी महफिल में , आएंगे कब। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

थक गया हूं , फ़ज़ूल के इस सफर से ।

थक गया हूं , फ़ज़ूल के इस सफर से । थोड़ा आ ऐ जिंदगी ! संग मेरे , तू भी सुस्ता ले । रहा है साथ तेरा जन्म से , और रहेगा मरण तक । सफर लम्बा रहा है , अब तलक । न जाने आगे रहेगा साथ , कब तलक । आ बैठ पास उर से निकल , पढ़ तो ! प्रभु ने भाग्य लेख में मेरे , क्या क्या रचना रची है । ढल गया हूं जिस्म से , देख तो । मेरे चेहरे पर चमक , कितनी बची है? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी"मलंग"

हाँ माँ सच तुम होती जो संग हमारे ।

 हाँ माँ मैने खाया आम कच्चा , मैं हूं तेरा लाडला बच्चा । एक आने के लिए फाल्से, दिए बाबा ने केवल चार । तुम भी होती संग नानी के , खाती तुम भी आम का अचार । नाना ने गाड़ी में बिठाया , मेला सारा हमें घुमाया । इक अन्नी का बजा मुझे , मुन्ना को गुब्बारा दिलवाया । नाना ने फिर टपरी में जाकर , चाय पकौड़ी और नमकीन खिलवाया । हाँ माँ ! सच तुम होती जो संग हमारे , चरखी , झूला , नाच कठपुतली का देख कर संग में बजाते ताली । शोर-शराबा कहीं हाथी भालू , नाच रही थी बंदरिया मतवाली । हाँ माँ मैंने खाया आम कच्चा ,मैं हूं तेरा लाडला बच्चा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी