सुनकर नज़्म तेरी सकूं मिला है कि ,है कोई जमाने में घायल मेरी ही तरह ।
काश कि रूबरू होते , जज़्बात तो कुछ और बात होती ।
कट जाता वक्त जो बचा है कुछ , अपनी कह सुनी में यूं ही ।
खामोशी के दरमियाँ जैसे , बजते हो ढोल निन्यारों के ।
झरते कुछ उधर कुछ इधर झरने रुखसारों पर ।
कुछ तुम कुछ हम ,घिरे रहते कुछ यूं अपने अपने विचारों से ।
यूं ही गुजर जाती गाड़ी जिंदगी की, रफ्तां रफ़्तां वक्त के इन रेगिस्तानों से ।
✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें