कुछ तो बात रही होगी, उम्र के इस पड़ाव में,
दुखाया होगा दिल, किसी अपनों के दिए घाव ने।
या ये हुआ होगा "मलंग", कि चोट गहरी खाई होगी,
"किया क्या हमारे लिए?"—बच्चों ने ऐसी खरी-खोटी सुनाई होगी।
बिगड़ा हुआ होगा शायद, संतुलन मनोदशा का,
कुछ तो बात उसने सीधे, दिल पर लगाई होगी।
हुए लापता क्यों? ऐसी कौन सी आफत आई होगी,
यूँ ही नहीं किसी ने, अपनी दुनिया भुलाई होगी।
**
गुमसुम से हुए हैं अब, जिंदगी के लम्हें,
खामोशी में बंद हुए हैं, उसके लब अब।
इक टकटकी सी लगी है नजर, किसी क्षितिज पर,
न जाने किधर?
दिल भटक रहा है, मंजिल की तलाश में,
अंजान राहों का सा हो, जैसे कोई मुसाफिर।
शुष्क हुई कभी थी जो, कोमल काया,
बंद हुए द्वार दया के अब, न बचा धर्म, न बची माया।
— ✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें