आज फिर मन मेरा भर आया ,
सदियां गुजर गई , मुझे मेरा गुजारा जमाना याद आया ।
आज फिर मन मेरा भर आया ।
बहुत खेले है खेल बचपन में ,
सोए भी खूब गोद में ,
मुझको मेरी माँ का , वो सहलाना याद आया ।
क्या क्या न ख्वाब बुने थे हमने , जवानी के जोश में ।
पंख लगा कर उड़े थे हम , बेपरवाह होकर ।
उम्मीद बांधकर चले थे , जिनके भरोसे पर ।
कर गया सरेआम जलील हमें , वो मेरा लखते जिगर ।
हुए रुसवा हम तो तब , होश में हम ये आया ।
काश संभलकर चले होते तो , आज ठोकर न खाते हम दर -ब - दर ।
आज फिर मन मेरा भर आया ,
सदियां गुजर गई , मुझे मेरा गुजारा जमाना याद आया ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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