न आग जली न धुआं हुआ, जल कर खाक तमाम हुआ।
होता कुछ और कोई बात नहीं, यहां तो घर अपना बर्बाद हुआ।
मैं गुजरे वक्त को टटोल कर देखता मगर, अब फायदा क्या "मलंग"
मुश्किल से समेटा हुआ हूँ मैं अभी।
कर दूं आगाज मैं फिर से, अपनी खुशियों का
तो डर है कि, किस की, नजर न लग जाए मुझ पर अभी।
आ बैठ थोड़ा सा सुस्ता ले, मंद मंद खुद में ही थोड़ा मुस्कुरा ले।
क्या पता हो जाए ठहर मेरी, खुशियों का।
लग जाए पर मेरे अरमानों पर, और उड़ूं जाऊं मैं शहर शहर।
मेरी खामोशी का शायद, मुझे मिल जाए इनाम क्या पता?
इस चुप का कहीं तो कुछ हासिल मुझे मेरा खुदा होगा।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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