मेरे इन आंसुओं में छिपी है, बाबा तेरी याद, हर लम्हा मेरे दिल को, आती है तेरी याद। तूने कहा था 'मोम' है दिल तेरा ऐ मेरे लाल, अपनों के बीच खुद ही को, जलाती है तेरी याद। मेरा मिज़ाज सख्त है, दुनिया की नज़र में, पर तेरी फिक्र बनके, पिघलाती है तेरी याद। "झुक जाना तू ही अगर, घर में सुकून रहे", वो सीख बनके राह, दिखाती है तेरी याद। जब स्वार्थ के रिश्तों में, खुद को अकेला पाया, तब हक की हकीकत, बताती है तेरी याद। कैसे मिटा दूँ दिल से, मैं तेरी निशानियां, धड़कन में बनके आस, जगाती है तेरी याद। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी